Friday, 11 November 2016

जय श्री बेम बम-बम भोले

जय श्री बेम बम-बम भोले

भोले बाबा हमारे है भोले-भोले।
भरते सदा है वो भक्तों की झोली
करते नहीं हैं वो एक पल की देरी
भोले बाबा को भावे हैं अदभूत व्यंजन
 भावों का भात और श्रद्धा की सब्जी
भावों का भोग भोले मन से लगाते
थालों का भोग भोले छूते नही हैं।
भोले बाबा हमारे है भोले-भोले॥

सावन महीना भोले को भाये
भांग धथूरा भोले को लुभाये
मृगा के छाल औढ़रदानी को भाये
पीला पीताम्बर भोले को लुभाये
अदभूत छवि है शंकरजी शंभाले
कालों के काल महाकाल विराजे
भोले बाबा हमारे है भोले-भोले॥

गंगा माँ  जटा में संभाले।
नाग और बिच्छ हैं तन पर विराजे
भूत और प्रेतों को हैं वो संभाले
कच्चा दूध भोले बाबा को भाये।
शमशानों के भभूत से बाबा हैं नहाये।
विष्णू अवतार हैभोले को रिझाये।
कामों के देव हैं उनके सहारे।
भोले बाबा हमारे है भोले-भोले॥

Saturday, 8 October 2016

नेवल हॉस्पिटल - कविता

नेवल हॉस्पिटल - कविता


काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते।
महाराष्ट्र के प्रांगण में, लोनावला के आँगन में॥

शिवाजी के गोद में, शोभ रही कस्तूरी है।
दिव्या मैम इसकी शान है तोह मिर्ज़ा सर इसके प्राण॥

प्रतिभाओं के फूलों और भावों की खुशबु से।
मरीज़ों में  डालते है वो प्राण....॥

काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते।


अस्पताल का रिसेप्शन हो या MI रूम।
अस्पताल का डिस्पेंसरी हो या हो यहाँ का लैब॥

अस्पताल का OPD हो या हो X-Ray रूम।
अस्पताल का फॅमिली वार्ड हो या हो जेंट्स वार्ड॥

अस्पताल का आपरेशन थिएटर हो या हो रसोई घर।
अस्पताल  का सफाई हो या हो यहाँ की सुव्यवस्था॥

हर जगह बिखेरे ओह जुनूनों की रौशनी।
काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते॥


हर मरीज़ों के घावों को तहे दिल से भरती।
हर मरीज़ों के भावों को तहे दिल से समझती॥

हर जगह बिखेरे वो प्रतिभावों की रौशनी। 
अगर प्रतिभा उसकी दिया है तोह, जूनून उसकी बाती॥

सुव्यवस्था के तेलों से हर-पल जले यह बाती।
काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते॥


दुश्मनों के बुरी नज़रों से वो खुद को बचाती।
अच्छे पलों को वो यूँ न गंवाती॥

सहजे-सँवारे वो सबके गुणों को।
बाहर भगाये वो अपने दुश्मनों को॥

उनकी लड़ाई बिमारी से जारी।
खुशियों को रहती गले वो लगाए॥

मरीज़ों के चेहरे पर खुशियाँ वो लाती।
काश हम कस्तूरी में होते, काश हम भी नेवी में होते॥

परिवार के एडमिरल साहब - कविता

परिवार के एडमिरल साहब - कविता


मग्न है वो भाव से भोजन बना रही।
सजा  रही है वो व्यंजनों को प्रेम में है मग्न॥

भाव में विभोर है थाली सजा रही।
दे दिया आवाज वो आ जाये खाने को॥

कर दिया डिटेल और में हो गया डिस्टर्ब।
सो रहा था नींद में जगा दिया तूने॥

बना कर रख दो खाना और तू हो जाओ फ्री।
मत बना रिपोर्ट और तू मत करो कमांड॥

सज रही सवर रही, मंदिर है जाने को।
चल दिए है साथ में साहब भी जाने को॥

घर के कपड़ो में देखकर बोली वह साहब से।
बार-बार बोला है मैंने मत करो तुम चेक॥

मैं जो बोलता हूँ तुम वही किया करो।
मेरी कही बातो को तुम यूँ कट मत किया करो॥

Sunday, 28 August 2016

जामुन की टोकरी - कविता

जामुन की टोकरी - कविता


छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।
सपने संजोकर निकल पड़ी, व्वो टोकरी लिए॥
देख रहा हर पेड़ों को, आशा की दृष्टि से।
हिला रहा हर डाल को उम्मीद की बम्बू से॥
फटे-पुराने चादरे निगाहे टिकी  हुई।
कास के पकडे चादरों को झुंड खड़ी हुई॥


छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।
सहेज रही हर जामुनों को टोकरी में भर॥
बोहनी के नाम पर वोह खुश हो गई।
बाँधी ही थी टोकरी को आ गयी आफत॥
लगा रही गुहार है, आफत से बचने को।
आफत है कि तैयार नहीं उसे छोड़ने को॥


छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।
छीन लिए वो झुंड ने जामुन की टोकरी॥
बिखड़ गए वो सपने जो संजोकर निकली थी।
किसी के घर की रोटी है, तो किसी का टाइमपास॥
मरीज की दवा है तो बच्चों की ज़िन्दगी।
किसी के तन का कपड़ा है तो किसी की रौशनी॥

छोटी सी टोकरी है पर है कमाल की।

Wednesday, 17 August 2016

मेरी आकांक्षा - कविता

मेरी आकांक्षा - कविता 


आश नहीं मैं आंसू बनकर - दुनिया के दिलो में बस जाऊँ।
बस आश यही है खुशियाँ बनकर - सबके दिलो में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं चीटर बनकर - अपनी छवि बनाऊँ।
बस आश यही है आशा बनकर - सबके मन में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं लालच बनकर - दुसरो का धन-दौलत ले लूँ।
बस आश यही है - संतुष्टि को अपनी छवि बनाऊँ॥

आश नहीं मैं तृष्णा बनकर - काल-कोठरी में बस जाऊँ।
बस आश यही मैं समर्पण बनकर - अपनी खुशियों में बस जाऊँ॥

आश नहीं में क्रोधाग्नि बनकर - चिताग्नि को जलाऊँ।
बस यही मैं देवाग्नि बनकर - श्रद्धाग्नि में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं आरक्षण बनकर - भेद भाव में बंध जाऊँ।
बस यही मैं मेधावी बनकर - अपने जीवन को चमकाऊँ॥

आश नहीं मैं नफरत बनकर - अपनी नज़रों से गिर जाऊँ।
बस आश यही मैं आकर्षण बनकर - माँ के चरणों में बस जाऊँ॥

आश नहीं मैं बाधा बनकर - दुसरो के पथ को रो कूँ।
बस आह यही जूनून बनकर - हर सपने को साकार करूँ॥

आश नहीं मैं इंसानो से - गैरों सा व्यव्हार करूँ।
बस आश यही मैं दोस्त बनकर - अपनों सा व्यव्हार करूँ॥

Tuesday, 7 June 2016

मेरी माँ से ऊपर एक माँ - कविता

मेरी माँ से ऊपर एक माँ - कविता


ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही विराजे ज्वाला जी माँ, कही विराजे काली। 
हाथों में हथियार लिए माँ दुष्टों से है बचाती॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही खड़ी माँ चण्डी बनकर, कही बानी चामुण्डा।
कण - कण में है वास करे तू, भक्तों को है संभाला॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही सजी माँ नैना बनकर, कही सजी माँ वैष्णो।
भक्तों की तू झोली भरती, देती है तू दुआएँ॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

कही खड़ी माँ दुर्गा बनकर, कही बनी माँ लक्ष्मी।
भक्त पुकारे आर्त भाव से - हे माँ मुझे बचाओ॥

ओ माँ मेरी माँ -  ओ माँ मेरी माँ।

Wednesday, 25 May 2016

नारी की रौनकता - कविता

नारी की रौनकता - कविता


माँ की ममता के चमन में - कर रहा गुजार तू।
आहर सूना है जब से माँ ने - आवाज अपने लाल की॥

करती नहीं वो एक पल भी - देर अपने प्यार की।
ममता के साँसों की खुशबू - महक रही गुड़िया बनकर॥

दिल की धड़कन माँ का है तू - दमक रहा गुड्डा बनकर।
चहल - पहल है आँगन का तू - दरवाजे का नूर है तू॥

सज रहा है पालने में - जल रहे प्रतिद्वन्दियाँ।
सर्वस्व है तू ज़िन्दगी का - और है मसाल तू॥

गा रहा है गीत तू - और दे रहा आवाज़ तू।
ज़िन्दगी की राह है तू - और है पहचान तू॥

लक्ष्य है तू ज़िन्दगी का - दे दिया दस्तक है तू।
व्यक्तित्व है तू ज़िन्दगी का - कर दिया मालामाल है॥

किलकारियों की कलियाँ बनकर - खिल रहा वो प्यार का।
अरमानो के फूल बनकर - सज रहे व्यवहार में॥

ज़िन्दगी की शान है और - बढ़ा रहा गौरव है तू।
चिलचिलाती धुप की - बहुत बड़ी ठंडक है तू॥

ज़िन्दगी के मेघ ने जब दे दिया त्रासदी।
आ गए जहाज बनकर - दे दिया आराम तू॥

सजा रही है आरती की - थाल अपने दुलार की।
मग्न है वो काम में और - मस्त है बहार में॥